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ग़ज़ल
हैदर अली आतिश
ग़ज़ल
ख़तर है रिश्ता-ए-उल्फ़त रग-ए-गर्दन न हो जावे
ग़ुरूर-ए-दोस्ती आफ़त है तू दुश्मन न हो जावे
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
जिस ज़मीं पर तिरा नक़्श-ए-कफ़-ए-पा होता है
एक इक ज़र्रा वहाँ क़िबला-नुमा होता है