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ग़ज़ल
जिगर मुरादाबादी
ग़ज़ल
बहुत मुद्दत के नख़चीरों का अंदाज़-ए-निगह बदला
कि मैं ने फ़ाश कर डाला तरीक़ा शाहबाज़ी का
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
क्यूँकर हुआ है फ़ाश ज़माने पे क्या कहें
वो राज़-ए-दिल जो कह न सके राज़-दाँ से हम
असरार-उल-हक़ मजाज़
ग़ज़ल
तू ने ये क्या ग़ज़ब किया मुझ को भी फ़ाश कर दिया
मैं ही तो एक राज़ था सीना-ए-काएनात में
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
किया है फ़ाश पर्दा कुफ़्र-ओ-दीं का इस क़दर मैं ने
कि दुश्मन है बरहमन और 'अदू शैख़-ए-हरम मेरा
चकबस्त बृज नारायण
ग़ज़ल
फ़ाश राज़-ए-दिल नहीं करता मगर ये डर तो है
बे-ख़ुदी में आह लब से आश्ना हो जाएगी
हकीम मोहम्मद अजमल ख़ाँ शैदा
ग़ज़ल
जुनूँ के जोश में इंसान रुस्वा हो ही जाता है
गरेबाँ फाड़ने से फ़ाश पर्दा हो ही जाता है