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ग़ज़ल
हिजाब-ए-राज़ फ़ैज़-ए-मुर्शिद-ए-कामिल से उठता है
नज़र हक़-आश्ना होती है पर्दा दिल से उठता है
शेर सिंह नाज़ देहलवी
ग़ज़ल
जो मुर्शिद-ए-कामिल है वो ख़ुर्शीद के मानिंद
बख़्शे है मुरीदों को ज़िया कुछ नहीं कहता
मोहन सिंह दीवाना
ग़ज़ल
तुझे इस तरह भी देखा कभी हम ने माह-ए-'कामिल'
कि उठीं तिरी निगाहें तो नज़र बचा गए हम
कामिल चाँदपुरी
ग़ज़ल
साहिब-ए-दिल है वही मुर्शिद-ए-कामिल है वही
मेरे चेहरे से जो मेरा ग़म-ए-पिन्हाँ समझा
मुंशी नौबत राय नज़र लखनवी
ग़ज़ल
लोग जा भी पहुँचे तूफ़ानों के सीने चीर कर
कश्ती-ए-'कामिल' किनारों में उलझ कर रह गई
कामिल चाँदपुरी
ग़ज़ल
बुझ गए सारे चराग़-ए-जिस्म-ओ-जाँ तब दिल जला
ख़ल्क़ की ख़ातिर हमारा मुर्शिद-ए-कामिल जला