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ग़ज़ल
ये रंग पाश हुए हैं वो आज ऐ 'नादिर'
है फ़र्श-ए-बज़्म-ए-तरब लाला-ज़ार होली में
कल्ब-ए-हुसैन नादिर
ग़ज़ल
आले रज़ा रज़ा
ग़ज़ल
नस्ब करें मेहराब-ए-तमन्ना दीदा ओ दिल को फ़र्श करें
सुनते हैं वो कू-ए-वफ़ा में आज करेंगे नुज़ूल मियाँ
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
तजल्ली गर तिरी पस्त ओ बुलंद उन को न दिखलाती
फ़लक यूँ चर्ख़ क्यूँ खाता ज़मीं क्यूँ फ़र्श हो जाती
मज़हर मिर्ज़ा जान-ए-जानाँ
ग़ज़ल
दुख न पावे कहीं वो नाज़नीं-गर्दन प्यारे
तकिया ज़िन्हार सर-ए-बालिश-ए-मख़मल न करो
आफ़ताब शाह आलम सानी
ग़ज़ल
रात आँखों में मिरी गर्द-ए-सियह डाल के वो
फ़र्श-ए-बे-ख़्वाबी-ए-वहशत पे सुलाता है मुझे
अहमद महफ़ूज़
ग़ज़ल
जाओ जो चमन को तो करे फ़र्श-ए-रह-ए-नाज़
बुलबुल जिगर-ओ-फ़ाख़ता दिल कब्क-ए-दरी आँख
ख़्वाज़ा मोहम्मद वज़ीर
ग़ज़ल
त'अज्जुब से मिरे पैरों के छाले देखने वालो
रह-ए-हस्ती में फ़र्श-ए-सब्ज़ा-ओ-शबनम नहीं होता
अब्ब्दुर्रऊफ़ शाहिद अंसारी
ग़ज़ल
रक़्स-ए-ज़मीं को गर्दिश-ए-अफ़्लाक चाहिए
नक़्श-ए-क़दम को फ़र्श-ए-ख़स-ओ-ख़ाक चाहिए
नरजिस अफ़रोज़ ज़ैदी
ग़ज़ल
जो लूटते हैं मज़े फ़र्श-ए-गुल के बिस्तर पर
वो फ़र्श-ए-ख़ाक पे सोएँगे इस जहान के बा'द