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ग़ज़ल
क्या हुआ गर शैख़ यारो हाजी-उल-हरमैन है
तौफ़-ए-दिल का हक़ में उस के दीन फ़र्ज़-ए-ऐन है
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
ग़ज़ल
दर-ब-दर कार-ए-हवस उन पर ख़सारे सफ़-ब-सफ़ थे
वक़्त और परछाइयों की जंग में हम किस तरफ़ थे
ऐन ताबिश
ग़ज़ल
इश्तियाक़-ए-दीद में फ़ानी है सहराओं की रेत
रह-नवर्दी में उभरते ग़म के छालों को भी रोक
ऐश शुजाबादी
ग़ज़ल
हिसाब-ए-दर्द तो यूँ सब मिरी निगाह में है
जो मुझ पे हो न सकीं वो नवाज़िशें लिखना
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
कुछ तो कर दरिया मिरे इन को डुबो या पार कर
कश्तियों ने अपना दुख आब-ए-रवाँ पर लिख दिया
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
इक इम्तिहान-ए-वफ़ा है ये उम्र भर का अज़ाब
खड़ा न रहता अगर ज़लज़लों में क्या करता