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ग़ज़ल
ग़म्ज़ा-ओ-नाज़-ओ-अदा शोख़ी-ओ-बेबाकी-ओ-हुस्न
एक ही जुर्म-ए-गुनह में हुए क़ातिल दो-चार
अहमद हसन फ़िदा
ग़ज़ल
जब 'फ़िदा' वो काएनात-ए-दिल में रहता ही नहीं
फिर तिरी यादों पर उस का इस क़दर पहरा है क्यों
वसीम अहमद फ़िदा
ग़ज़ल
जिन को दुनिया से मोहब्बत है ख़ुदा से बढ़ कर
ऐ 'फ़िदा' उन पे तो रहमत नहीं होने वाली
वसीम अहमद फ़िदा
ग़ज़ल
भूले हैं अपने फ़र्ज़ को ये ख़्वाजगान-ए-हिन्द
हक़ देने में भी करते हैं इंकार आज-कल
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
अब कोई तिरा मिस्ल नहीं नाज़-ओ-अदा में
अंदाज़ में शोख़ी में शरारत में हया में
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
सदा सुनते ही गोया मुर्दनी सी छा गई मुझ पर
ये शोर-ए-सूर था या वस्ल का इंकार था क्या था
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
है नाज़-ए-मुफ़्लिसाँ ज़र-ए-अज़-दस्त-रफ़्ता पर
हूँ गुल-फ़रोश-ए-शोख़ी-ए-दाग़-ए-कोहन हुनूज़
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
ऐ अदू-ए-मस्लहत चंद ब-ज़ब्त अफ़्सुर्दा रह
करदनी है जम्अ' ताब-ए-शोख़ी-ए-दीदार-ए-दोस्त
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
दीदा-ओ-दिल पे किया करती है क्या क्या जादू
मस्ती-ओ-शोख़ी-ए-चश्मान-ए-ग़ज़ालाँ हर शब