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ग़ज़ल
आह ये मजमा-ए-अहबाब ये बज़्म-ए-ख़ामोश
आज महफ़िल में 'फ़िराक़'-ए-सुख़न-आरा भी नहीं
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
ख़ुदा-ओ-अहरमन बदले वो ईमान-ए-दुई बदला
हदूद-ए-ख़ैर-ओ-शर बदले मज़ाक़-ए-काफ़िरी बदला
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
ग़म-कदे में दहर के यूँ तो अँधेरा था मगर
इश्क़ का दाग़-ए-सियह-बख़्ती चराग़-ए-शाम था