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ग़ज़ल
कहीं ग़ुरूर तकब्बुर कहीं फ़ुतूर-ए-ख़ुदी
हमारी राह में रहज़न बिठाए जाते हैं
लक्ष्मी नारायण फ़ारिग़
ग़ज़ल
मुर्ग़-ए-सहर अदू न मोअज़्ज़िन की कुछ ख़ता
'परवीं' शब-ए-विसाल में सब है फ़ुतूर-ए-सुब्ह
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
फ़ुतूर-ए-निय्यत-ए-साक़ी से निभ न सकती थी
हम अपने जाम को मयख़ाने ही में तोड़ आए
कृष्ण गोपाल मग़मूम
ग़ज़ल
कहीं इस फूटे-मुँह से बेवफ़ा का लफ़्ज़ निकला था
बस अब ता'नों पे ता'ने हैं कि बे-शक बा-वफ़ा तुम हो
मुज़्तर ख़ैराबादी
ग़ज़ल
तीन मोहल्लों में उन जैसी क़द काठी का कोई न था
अच्छे-ख़ासे ऊँचे पूरे क़द-आवर थे बाबू जी