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ग़ज़ल
पानी देने वाला जब कुछ रोज़ में उस को भूल गया
आख़िर इक दिन पौदे ने गमले में रहना छोड़ दिया
ज़ेहरा शाह
ग़ज़ल
क्यूँ मेरी जड़ें जा के ज़मीं से नहीं मिलतीं
गमले की तरह सहन में रक्खा हुआ क्यूँ हूँ
अशफ़ाक़ हुसैन
ग़ज़ल
तेरे गुलदान तिरे घर की मैं ज़ीनत के लिए
गुल की सूरत किसी गमले से निकल आया हूँ
अब्दुल हक़ सहर मुज़फ़्फ़रनगरी
ग़ज़ल
त'अल्लुक़ात के तोहफ़े सँभाल कर रखना
मिले हैं ज़ख़्म जो गहरे सँभाल कर रखना