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ग़ज़ल
गर्दिश-ए-चर्ख़ का रुख़ हो कि ज़माने का मिज़ाज
सिर्फ़ हम दीदा-ए-बेदार से पहचानते हैं
मंशाउर्रहमान ख़ाँ मंशा
ग़ज़ल
मक़्सद था मिले ग़म से नजात इस लिए ऐ 'चर्ख़'
इक उम्र मिरी वक़्फ़-ए-ख़िराजात हुई है
चरख़ चिन्योटी
ग़ज़ल
ग़म-ओ-'इशरत का मुरक़्क़ा' है ये दुनिया ऐ 'चर्ख़'
कभी काँटों कभी फूलों पे बसर होती है
चरख़ चिन्योटी
ग़ज़ल
जिन्हें अपना कभी कहते थे हम उन को ही बेगाना
ब-फ़ैज़-ए-गर्दिश-ए-चर्ख़-ए-कुहन कहना ही पड़ता है
हसन जाफ़री
ग़ज़ल
तस्वीर से किसी की 'मुसव्विर' है हम-कलाम
थम जा ज़रा तू गर्दिश-ए-चर्ख़-ए-कुहन अभी