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ग़ज़ल
मैं तो भोला-भाला 'वसीम' और वो फ़नकार सियासत का
उस के जब घटने की बारी आई मुझ को जोड़ लिया
वसीम बरेलवी
ग़ज़ल
अब्दुर्रशीद ख़ान कैफ़ी महकारी
ग़ज़ल
न घटने पर ही सुकून मिलता न बढ़ने पर ही क़रार आए
तबीब मुझ को यूँ लग रहा है मरज़ न मेरा है 'आम कोई