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ग़ज़ल
नए दौर के नए ख़्वाब हैं नए मौसमों के गुलाब हैं
ये मोहब्बतों के चराग़ हैं इन्हें नफ़रतों की हवा न दे
बशीर बद्र
ग़ज़ल
दाग़ देहलवी
ग़ज़ल
उस की आँखों से बरसती है सदा ही रेशम
किस की यादों में शब-ओ-रोज़ घुला करता है