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ग़ज़ल
रहा है तू ही तो ग़म-ख़्वार ऐ दिल-ए-ग़म-गीं
तिरे सिवा ग़म-ए-फ़ुर्क़त कहूँ तो किस से कहूँ
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
फ़रिश्तो तुम कहाँ तक नामा-ए-आमाल देखोगे
चलो ये नेकियाँ गिन लो कि गठरी खोल दी हम ने
मुनव्वर राना
ग़ज़ल
आओ गर आना है क्यूँ गिन गिन के रखते हो क़दम
और कोई दम की है याँ दम-शुमारी रह गई
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
अब तक जो जी चुका हूँ जनम गिन रहा हूँ मैं
दुनिया समझ रही है कि ग़म गिन रहा हूँ मैं
सरफ़राज़ आरिश
ग़ज़ल
गुज़ारीं कितनी रातें गिन के तारे दर्द-ए-फ़ुर्क़त में
जुदाई का वो अफ़्साना न तुम भूले न हम भूले
कँवल डिबाइवी
ग़ज़ल
बे-ठिकाने है दिल-ए-ग़म-गीं ठिकाने की कहो
शाम-ए-हिज्राँ दोस्तो कुछ इस के आने की कहो
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
रौनक़-ए-बज़्म-ए-जहाँ था गो दिल-ए-ग़म-गीं 'फ़िराक़'
सर्द था अफ़्सुर्दा था महरूम था नाकाम था