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ग़ज़ल
इसी मिट्टी में मिल जाएगी पूँजी उम्र भर की
गिरेगी जिस घड़ी दीवार-ए-जाँ कैसा लगेगा
इफ़्तिख़ार आरिफ़
ग़ज़ल
आज यक़ीनन मेंह बरसेगा आज गिरेगी बर्क़ ज़रूर
अँखियाँ भी पुर-शोर बहुत हैं कजरा भी घनघोर बहुत
उमर अंसारी
ग़ज़ल
मस्तों की रूहें भटकेंगी अच्छा नहीं है अब
घिर-घिर के आना क़ब्रों पर अब्र-ए-बहार का