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ग़ज़ल
मिरा माज़ी नज़र आया मुझे हाल-ए-हसीं हो कर
जो उन के साथ देखे थे वो मंज़र याद आते हैं
ए. डी. अज़हर
ग़ज़ल
किस तरह वाक़िफ़ हों हाल-ए-आशिक़-ए-जाँ-बाज़ से
उन को फ़ुर्सत ही नहीं है कारोबार-ए-नाज़ से
ग़ुलाम भीक नैरंग
ग़ज़ल
अगर ज़बाँ से बयाँ हाल-ए-ग़म न हो पाया
हुज़ूर-ए-दोस्त मिरी ख़ामुशी ने साथ दिया
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
हाथ रखते ही था हाल-ए-क़ल्ब-ए-मुज़्तर आईना
दस्त-ए-नाज़ुक है हसीनों का मुक़र्रर आईना
मुंशी नौबत राय नज़र लखनवी
ग़ज़ल
दोस्तो हाल-ए-दिल-ए-ज़ार ज़रा उस से कहो
कम न हो इस में ज़रा बल्कि सिवा उस से कहो
किशन कुमार वक़ार
ग़ज़ल
बद्र-ए-आलम ख़लिश
ग़ज़ल
कहीं सुब्ह-ओ-शाम के दरमियाँ कहीं माह-ओ-साल के दरमियाँ
ये मिरे वजूद की सल्तनत है अजब ज़वाल के दरमियाँ
बद्र-ए-आलम ख़लिश
ग़ज़ल
उस ने हाल-ए-दिल-ए-नाशाद न देखा न सुना
ऐसा ज़ालिम सितम-ईजाद न देखा न सुना
फ़हीमुद्दीन अहमद फ़हीम
ग़ज़ल
क़ाबिल-ए-शरह मिरा हाल-ए-दिल-ए-ज़ार न था
सुनने वाले तो बहुत थे कोई ग़म-ख़्वार न था