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ग़ज़ल
इस ज़ुल्फ़-ओ-रुख़-ओ-लब पे उन्हें क्यूँ न हो नख़वत
तातार है उन का हलब उन का यमन उन का
अकबर इलाहाबादी
ग़ज़ल
नश्शा-ए-दौलत से मुनइ'म पैरहन में मस्त है
मर्द-ए-मुफ़्लिस हालत-ए-रंज-ओ-मेहन में मस्त है
हैदर अली आतिश
ग़ज़ल
शाद अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
सौदा-गर-ए-सफ़ा-ए-दिल-ए-बे-ग़ुबार हैं
अज्नास-ए-शीशा लाए हैं शहर-ए-हलब से हम
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
हज़ार कूफ़ा ओ हलब गुज़र रहे हैं रोज़ ओ शब
मैं जिस तरफ़ चला हूँ उस नगर में कितनी देर है
अहमद शहरयार
ग़ज़ल
वो साफ़ रुख़ पे जो ज़ुल्फ-ए-सियाह-फ़ाम नहीं
पता ये है कि हलब के क़रीब शाम नहीं
फ़ज़ल हुसैन साबिर
ग़ज़ल
कभी मुल्क-ए-हलब में हूँ कभी शहर-ए-ख़ुतन में हूँ
नहीं रहता तिरी शोहरत की सूरत एक सू हो कर