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ग़ज़ल
था समाअ'त पे वही फ़िक़्रों का बोझल शब-ख़ूँ
मैं भी था हल्क़ा-ए-अहबाब था चारों जानिब
असलम मिर्ज़ा
ग़ज़ल
निकाल लाया हूँ ख़ुद को सफ़-ए-'अदू से मैं
मगर अब हल्क़ा-ए-अहबाब में फँसा हुआ हूँ
सय्यद मोहम्मद ताजील मेहदी
ग़ज़ल
ये हर्फ़-ए-तल्ख़ 'सैफ़ी' हल्क़ा-ए-अहबाब तक पहुँचे
ब-क़ैद-ए-मस्लहत हरगिज़ मुलाक़ातें नहीं अच्छी
सैफ़ी प्रेमी
ग़ज़ल
मैं पहले देता हूँ तरतीब हल्क़ा-ए-अहबाब
फिर अपने लोगों को अपने ख़िलाफ़ करता हूँ