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ग़ज़ल
न हम-पेशा न हम-ख़ाना न हम-प्याला न हम-बिस्तर
वही अपना है 'रहबर' जो भी हम-आवाज़ होता है
जितेन्द्र मोहन सिन्हा रहबर
ग़ज़ल
सिधारी क़ुव्वत-ए-दिल ताब और ताक़त से कह दीजो
हुए हैं ना-तवाँ हम बिस्तर-ए-राहत से कह दीजो
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
हिक़ारत की नज़र से देखता है हर बशर मुझ को
ज़माना बोलता है तुम भी कह लो दर्द-ए-सर मुझ को
शादाब अंजुम
ग़ज़ल
हम बिखर जाएँगे नग़्मों-भरे ख़्वाबों की तरह
मुतरिबा! छेड़ कभी हम को रबाबों की तरह
प्रेम वारबर्टनी
ग़ज़ल
अब तो ख़ुद से भी कुछ ऐसा है बशर का रिश्ता
जैसे परवाज़ से टूटे हुए पर का रिश्ता