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ग़ज़ल
हुस्न-ए-अख़्लाक़-ओ-मोहब्बत की फ़ज़ा छोड़ आए
हम जहाँ पहुँचे वहाँ बू-ए-वफ़ा छोड़ आए
शाद फ़िदाई देहलवी
ग़ज़ल
हुस्न-ए-अख़्लाक़ की तासीर यक़ीनी है 'अज़ीज़'
इस से दुश्मन को दबाओ तो कोई बात बने
अज़ीज़ मुरादाबादी
ग़ज़ल
हुस्न-ए-अख़्लाक़ के पैकर थे हमारे बच्चे
उन के हाथों में थमाया है ये पत्थर किस ने
अअज़ीक़ुरहमान सारिम
ग़ज़ल
बुतों के 'इश्क़ में खोया गया हूँ वर्ना ऐ 'अख़्तर'
ख़ुदा शाहिद है मैं अक्सर ख़ुदा को याद करता हूँ
हरी चंद अख़्तर
ग़ज़ल
मैं पस्ती-ए-अख़्लाक़-ए-बशर देख रहा हूँ
फिर नज़्म-ए-जहाँ ज़ेर-ओ-ज़बर देख रहा हूँ