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ग़ज़ल
उसे महसूस कर सकता भला क्या ज़ौक़-ए-इबलीसी
कि जन्नत से निकलने में दिल-ए-आदम पे क्या गुज़री
सअादत नज़ीर
ग़ज़ल
मौज-ए-दरिया के लबों पर तिश्नगी है कर्बला
रेग-ए-साहिल पर तड़पती ज़िंदगी है कर्बला
नुज़हत अब्बासी
ग़ज़ल
सुनहरे ख़्वाब आँखों में बुना करते थे हम दोनों
परिंदों की तरह दिन भर उड़ा करते थे हम दोनों
हसन अब्बासी
ग़ज़ल
तसनीम आबिदी
ग़ज़ल
कितनी दुश्वार है पीरान-ए-हरम की मंज़िल
इस तरफ़ फ़ित्ना-ए-इब्लीस उधर रब्ब-ए-जलील
असरार-उल-हक़ मजाज़
ग़ज़ल
रवय्ये मार देते हैं ये लहजे मार देते हैं
वही जो जान से प्यारे हैं रिश्ते मार देते हैं