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ग़ज़ल
जिस्म ऐ 'बेताब' चलती फिरती ज़िंदा लाश है
वक़्त का तूफ़ाँ ख़िरद की धज्जियाँ तक ले गया
बेताब कैफ़ी
ग़ज़ल
अब के तो 'बेताब' मुरी में कुछ कुछ आग बरसती थी
जलते सहरा आ निकले थे भीगे हुए कोहसारों में