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ग़ज़ल
रोज़-ए-अव्वल से है फ़ितरत का रक़ीब आदम-ज़ाद
धूप निकली तो मिरे जिस्म से साया निकला
अहमद नदीम क़ासमी
ग़ज़ल
कब से न जाने गलियों गलियों साए की सूरत फिरते हैं
किस से दिल की बात करें हम शहर है उस हर जाई का
कलीम उस्मानी
ग़ज़ल
मुझे कोई ऐसी ग़ज़ल सुना कि मैं रो पड़ूँ
ज़रा जय जय विन्ती के सुर लगा कि मैं रो पड़ूँ
जब्बार वासिफ़
ग़ज़ल
सब तोड़ के बंधन दुनिया के मैं प्यार की जोत जगाऊँगी
अब माया-जाल से निकलूँगी और जोगनिया कहलाऊँगी
शबनम शकील
ग़ज़ल
कभी आँखों में रुके कोई गुज़रता हुआ पल
कभी साँसों में अटक जाती है चलती हुई रात
याह्या ख़ान यूसुफ़ ज़ई
ग़ज़ल
जलती धूपें प्यासा पंछी नहर किनारे उतरेगा
जब भी कोई ज़ख़्म दिखा है अंग पिया के लागे हम
अहसन यूसुफ़ ज़ई
ग़ज़ल
गर उन से पूछा जाए आप ने आख़िर किया ही क्या
खड़ी कर आठ दस ईंटें उसे मीनार कह देंगे