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ग़ज़ल
ऋषि पटियालवी
ग़ज़ल
बद्र-ए-आलम ख़लिश
ग़ज़ल
बद्र-ए-आलम ख़लिश
ग़ज़ल
शाम तम्हीद-ए-ग़ज़ल रात है तकमील-ए-ग़ज़ल
दिन निकलते ही निकल जाती है जाँ हम-नफ़सो
बद्र-ए-आलम ख़लिश
ग़ज़ल
हुस्न शाइस्ता-ए-तहज़ीब-ए-अलम है शायद
ग़म-ज़दा लगती हैं क्यूँ चाँदनी रातें अक्सर
जाँ निसार अख़्तर
ग़ज़ल
कोई आज़ुर्दा करता है सजन अपने को हे ज़ालिम
कि दौलत-ख़्वाह अपना 'मज़हर' अपना 'जान-ए-जाँ' अपना
मज़हर मिर्ज़ा जान-ए-जानाँ
ग़ज़ल
मुद्दत हुई उस जान-ए-हया ने हम से ये इक़रार किया
जितने भी बदनाम हुए हम उतना उस ने प्यार किया
जाँ निसार अख़्तर
ग़ज़ल
कभी थीं खिड़कियाँ रूमान-पर्वर जान-ए-आलम
ये गलियाँ वो नहीं हैं ये दरीचा मुख़्तलिफ़ है
इशरत आफ़रीं
ग़ज़ल
'मुश्तरी' हिज्र की शब उमड़ा है तूफ़ान-ए-अलम
तार बिजली नज़र आते हैं शब-ए-तार घटा
कामरान जान मुश्तरी
ग़ज़ल
ख़ुद इश्क़ क़ुर्ब-ए-जिस्म भी है क़ुर्ब-ए-जाँ के साथ
हम दूर ही से उन को पुकार आए ये नहीं
जाँ निसार अख़्तर
ग़ज़ल
मिस्ल-ए-आईना के ज़ाहिर में सफ़ा हैं तो क्या
अहल-ए-आलम में है बातिन की सफ़ा की ख़ूबी