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ग़ज़ल
जान-ए-बहार-ए-ज़िंदगी आँखें ज़रा मिलाए जा
गुलशन-ए-क़ल्ब पर मिरे बर्क़-ए-नज़र गिराए जा
नाज़िश सिकन्दरपुरी
ग़ज़ल
कब मिलता है सुख-चैन हमें कब ग़म से रिहाई होती है
हर वक़्त कलेजा फुंकता है लब पर जान आई होती है
अमीर चंद बहार
ग़ज़ल
ज़िंदगी के दश्त में आया न जब अक्स-ए-बहार
मैं ने ख़ुद को ख़ुद दिखाया वहशतों का सिलसिला