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ग़ज़ल
जान आ बर में कि फिर कुछ ग़म-ओ-वसवास नहीं
तू नहीं पास तो फिर कुछ भी मिरे पास नहीं
मिर्ज़ा ज़हीरुद्दीन अज़फ़री
ग़ज़ल
रक़ीबाँ की न कुछ तक़्सीर साबित है न ख़ूबाँ की
मुझे नाहक़ सताता है ये इश्क़-ए-बद-गुमाँ अपना
मज़हर मिर्ज़ा जान-ए-जानाँ
ग़ज़ल
मुद्दत हुई उस जान-ए-हया ने हम से ये इक़रार किया
जितने भी बदनाम हुए हम उतना उस ने प्यार किया
जाँ निसार अख़्तर
ग़ज़ल
ख़ुद इश्क़ क़ुर्ब-ए-जिस्म भी है क़ुर्ब-ए-जाँ के साथ
हम दूर ही से उन को पुकार आए ये नहीं
जाँ निसार अख़्तर
ग़ज़ल
हकीम आग़ा जान ऐश
ग़ज़ल
जान-ए-मुज़्तर को न हो क्यूँ दिल-ए-बेताब से हज़
होता अहबाब को है सोहबत-ए-अहबाब से हज़
हकीम आग़ा जान ऐश
ग़ज़ल
थी यही ख़ुशी उन की इस लिए सुना हम ने
जान-ओ-दिल किया कैसे वक़्फ़-ए-इम्तिहाँ अपना
हकीम आग़ा जान ऐश
ग़ज़ल
हुआ है रंग-ए-हिना 'ऐश' ज़ेब-ए-पा उस के
ये जाए-ए-रश्क है रुत्बा हो ये हिना के लिए
हकीम आग़ा जान ऐश
ग़ज़ल
न ये कि हर कस-ओ-ना-कस के भाट जाइए बन
पए-उमीद-ए-ज़र-ए-नक़्द-ओ-हिर्स-ए-नाँ के लिए