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ग़ज़ल
कोई आज़ुर्दा करता है सजन अपने को हे ज़ालिम
कि दौलत-ख़्वाह अपना 'मज़हर' अपना 'जान-ए-जाँ' अपना
मज़हर मिर्ज़ा जान-ए-जानाँ
ग़ज़ल
इक इम्तिहान-ए-वफ़ा है ये उम्र भर का अज़ाब
खड़ा न रहता अगर ज़लज़लों में क्या करता
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
मुझ को मेरी आगही आँखों से ओझल कर गई
उस ने जो कुछ लौह-ए-जाँ पर लिख दिया रौशन हुआ
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
चराग़-ए-ज़िंदगी है या बिसात-ए-आतिश-ए-रफ़्ता
जला कर रौशनी दहलीज़-ए-जाँ पर सोचते रहना
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
सफ़ीर-ए-जाँ हूँ हिसार-ए-बदन में क्या ठहरूँ
चमन-परस्तो न ख़ुशबू के बाल-ओ-पर बाँधो
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
बस यही ख़ाकिस्तर-ए-जाँ है यहाँ अपनी शनाख़्त
हो गया सारा बदन जब राख तो चमका हुनर