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ग़ज़ल
कोई आज़ुर्दा करता है सजन अपने को हे ज़ालिम
कि दौलत-ख़्वाह अपना 'मज़हर' अपना 'जान-ए-जाँ' अपना
मज़हर मिर्ज़ा जान-ए-जानाँ
ग़ज़ल
इक इम्तिहान-ए-वफ़ा है ये उम्र भर का अज़ाब
खड़ा न रहता अगर ज़लज़लों में क्या करता
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
दिल में मत ढूँड कि ऐ तालिब-ए-ईसार-ओ-वफ़ा
अब ये अल्फ़ाज़ किताबों में नज़र आते हैं
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
बस इसी बात पे वो शख़्स ख़फ़ा है मुझ से
शहर में तज़्किरा-ए-रस्म-ए-वफ़ा है मुझ से
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
फिर किसी ज़ख़्म के खुल जाएँ न टाँके देखो
रहने दो तज़्किरा-ए-रस्म-ए-वफ़ा रहने दो
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
मुझ को मेरी आगही आँखों से ओझल कर गई
उस ने जो कुछ लौह-ए-जाँ पर लिख दिया रौशन हुआ