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ग़ज़ल
तिरे कानों में गूँजी क्या मिरी आवाज़ जान-ए-मन
मैं रोता हूँ तबी'अत है बहुत ना-साज़ जान-ए-मन
अदनान हामिद
ग़ज़ल
कभी इस से तुम्हें देखूँ कभी उस से तुम्हें देखूँ
मिली हैं इस लिए आँखें मुझे ऐ जान-ए-मन दो दो
हामिद हुसैन हामिद
ग़ज़ल
कोई आज़ुर्दा करता है सजन अपने को हे ज़ालिम
कि दौलत-ख़्वाह अपना 'मज़हर' अपना 'जान-ए-जाँ' अपना
मज़हर मिर्ज़ा जान-ए-जानाँ
ग़ज़ल
मैं भी मेराज-ए-मोहब्बत चाहता हूँ जान-ए-मन
मुझ को अंदाज़-ए-मोहब्बत की हिदायातें सिखा
ज़की तारिक़ बाराबंकवी
ग़ज़ल
यूँ खींचता हूँ ग़ज़ल में तिरे बदन के ख़ुतूत
ये जान-ए-मन किसी बहज़ाद से नहीं होगा
याह्या ख़ान यूसुफ़ ज़ई
ग़ज़ल
मुद्दत हुई उस जान-ए-हया ने हम से ये इक़रार किया
जितने भी बदनाम हुए हम उतना उस ने प्यार किया