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ग़ज़ल
न मह ने कौंद बिजली की न शोले का उजाला है
कुछ इस गोरे से मुखड़े का झमकड़ा ही निराला है
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
जिस तरफ़ देखो उसी का है झमकड़ा वल्लाह
तालिब अल्लाह का लेता है हर इक शान में ढूँढ
क़ासिम अली ख़ान अफ़रीदी
ग़ज़ल
यूँ सजा चाँद कि झलका तिरे अंदाज़ का रंग
यूँ फ़ज़ा महकी कि बदला मिरे हमराज़ का रंग
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
मुझ को लगता है वो दिन भी 'साज़' क़यामत का होगा
जिस दिन भी उस का झुमका मिरे सिरहाने से निकलेगा
सिद्धार्थ साज़
ग़ज़ल
अपने कानों में पहन ले मेरे दिल की धड़कन
मैं तिरे वास्ते लाया हूँ ले झुमका दिल का