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ग़ज़ल
वो पेट दिल को लपेट लेवे वो नाफ़ जी को समेट लेवे
मज़ार जी का झपेट लेवे कुछ ऐसा पेड़ू फड़क रहा है
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
मिरी दास्ताँ का उरूज था तिरी नर्म पलकों की छाँव में
मिरे साथ था तुझे जागना तिरी आँख कैसे झपक गई
बशीर बद्र
ग़ज़ल
आँख झपकी कि इधर ख़त्म हुआ रोज़-ए-विसाल
फिर भी इस दिन पे क़यामत का गुमाँ है कि जो था
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
क्यूँ झपक जाती है रह रह के तिरी बर्क़-ए-निगाह
ये झिजक किस लिए इक कुश्ता-ए-दीदार तो है