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ग़ज़ल
बद्र-ए-आलम ख़लिश
ग़ज़ल
जो वो मेहर-ए-सिपहर-ए-हुस्न नाचे अपनी महफ़िल में
तो ज़ोहरा मशअ'ल-ए-मह ले के आए बज़्म-ए-अंजुम से
असद अली ख़ान क़लक़
ग़ज़ल
नरेश एम. ए
ग़ज़ल
नहीं कुछ ज़ेब ऐ मेहर-ए-सिपहर-ए-मा'दलत इस में
अयाँ 'चंदा' पे जो कुछ है नवाज़िश ये करम-फ़रमा
मह लक़ा चंदा
ग़ज़ल
पिन्हाँ तमाम ज़ुल्मत-ए-कुफ़्र-ओ-सितम हुई
तालेअ' जूँही वो मेहर-ए-सिपहर-ए-अरब हुआ
असद अली ख़ान क़लक़
ग़ज़ल
मैं ने सोचा था मिटा दूँ याद-ए-माज़ी के नुक़ूश
नींद ने आँखों में फिर यादों के पैकर रख दिए
शान-ए-हैदर बेबाक अमरोहवी
ग़ज़ल
अर्श से रुख़ जानिब-ए-दुनिया-ए-दूँ करना पड़ा
बंदगी में क्या से क्या ये सर निगूँ करना पड़ा
माज़िद सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
मुँह तिरा क्यूँ आज ज़ोर-ए-ना-तवानी फिर गया
उस के आते ही मिरे चेहरे पे पानी फिर गया
मुर्ली धर शाद
ग़ज़ल
ये किस मेहर-ए-सिपहर-ए-हुस्न ने रक्खे क़दम अपने
गुमान-ए-महर है हर ज़र्रा-ए-ख़ाक-ए-शहीदाँ पर
असद अली ख़ान क़लक़
ग़ज़ल
इल्म-ओ-जाह-ओ-ज़ोर-ओ-ज़र कुछ भी न देखा जाए है
बज़्म-ए-साक़ी में दिलों का ज़र्फ़ जाँचा जाए है