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ग़ज़ल
हलाक-ए-कारोबार-ए-ग़म भी रह कर ऐ 'नज़र' ख़ुश हूँ
लबों पर गर्दिश-ए-तक़दीर का शिकवा नहीं रहता
असजद नाज़री नज़र
ग़ज़ल
नज़र कानपुरी
ग़ज़ल
सुरूर-ओ-कैफ़ के आलम में अपनी होश खो बैठे
'नज़र' की चोट खा कर महव-ए-जल्वा हो गए हम तुम
नज़र बर्नी
ग़ज़ल
नज़र लखनवी
ग़ज़ल
देख लें शायद 'नज़र' वो दीदा-ए-इंसाफ़ से
ले चलो टूटे हुए दिल का बना कर आईना
मुंशी नौबत राय नज़र लखनवी
ग़ज़ल
हमेशा से 'नज़र' हम महव-ए-याद-ए-रू-ए-रौशन हैं
चमक इस दर्द की रस्सी से हम दिल में नूर-ए-जाँ हो कर
मुंशी नौबत राय नज़र लखनवी
ग़ज़ल
एक मंज़र पर नज़र ठहरे तो ठहरे किस तरह
हम मिज़ाज-ए-गर्दिश-ए-अय्याम ले कर आए हैं
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
सोचना क्या है अभी कार-ए-नज़र का मा-हसल
हम तो यूँ ख़ुश हैं कि आग़ाज़-ए-सफ़र आँखों का है
इरफ़ान सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
मिरा माज़ी नज़र आया मुझे हाल-ए-हसीं हो कर
जो उन के साथ देखे थे वो मंज़र याद आते हैं
ए. डी. अज़हर
ग़ज़ल
उस ने 'ताबाँ' कर दिया आज़ाद ये कह कर कि जा
तेरी आज़ादी में इक शान-ए-नज़र-बंदी भी है