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ग़ज़ल
बनाया है जिन्हें मैं ने मोहब्बत के गुलाबों से
तर-ओ-ताज़ा वो गुल-दस्ते तुम्हारे नाम करती हूँ
समीना गुल
ग़ज़ल
गड़ गए गुलबुन ज़मीं में देख कर बौना सा क़द
था कफ़-ए-गुल में जो ज़र गोया दफ़ीना हो गया
इमाम बख़्श नासिख़
ग़ज़ल
दस्त-ए-सय्याद भी आजिज़ है कफ़-ए-गुल-चीं भी
बू-ए-गुल ठहरी न बुलबुल की ज़बाँ ठहरी है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
जो फूल आज कफ़-ए-गुल-फ़रोश में देखा
वो बाग़बाँ के भी अब वहम में गुमाँ में नहीं