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ग़ज़ल
हुसूल-ए-ज़र न कस्ब-ए-रुत्बा-ए-ज़ी-शाँ पे रक्खी है
नज़र हम ने हमेशा ख़िदमत-ए-इंसाँ पे रक्खी है
मोहम्मद ख़ाँ साजिद
ग़ज़ल
शोहरत की तलब है कि है इज़हार का चसका
ये कसब-ए-सताइश है कि फिर कस्ब-ए-हुनर है
मोहम्मद अकरम जाज़िब
ग़ज़ल
हम ने क्या तरक़्क़ी की कस्ब-ए-इल्म-ओ-फ़न कर के
बावजूद-ए-कोशिश भी ख़ुद को बे-हुनर पाया
नुद्रत कानपुरी
ग़ज़ल
ले जाएँ अपनी बे-हुनरों पास-ए-इल्तिजा
रखते हैं लोग इस लिए कस्ब-ए-हुनर अज़ीज़
क़ुर्बान अली सालिक बेग
ग़ज़ल
जो कसब-ए-रिज़्क़ में ने'मत का पा गया मफ़्हूम
उसी अमीर का दिल भी फ़राग़ रहता है
मोहम्मद शरफ़ुद्दीन साहिल
ग़ज़ल
ख़ूब है सज़ा ये भी कस्ब-ए-कामयाबी की
एक शब की क़ीमत में अब तो उम्र-भर जागो
ज़ुल्फ़ेक़ार अहमद ताबिश
ग़ज़ल
'अश्क' उसूल-ए-कस्ब-ए-ज़र से तू नहीं है आश्ना
तिश्ना-ए-तकमील है तेरी हमा-दानी हनूज़
अश्क अमृतसरी
ग़ज़ल
ये मुनहसिर है कस्ब-ए-हलाल-ओ-हराम पर
होता है अब दुआ में असर कम बहुत ही कम