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ग़ज़ल
इश्क़ में वो घर है अपना जिस में से मजनूँ ये एक
ना-ख़लफ़ सारे क़बीले का हमारे नंग है
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
न यूँ माँ-बाप अपनी ना-ख़लफ़ औलाद को रोते
अगर हर एक दिन उन का न फ़ाक़ों में ढला होता
अब्दुर्रज़्ज़ाक़ दिल
ग़ज़ल
शान-ए-इश्क़ औला है मजनूँ दूदमान-ए-इश्क़ से
ना-ख़लफ़ ना-क़ाबिल ओ नालायक़ ओ नाकारा था
हैदर अली आतिश
ग़ज़ल
अगर हो जाए बेटा ना-ख़लफ़ तो बूढ़ी आँखों के
सजे होते हैं जितने भी वो सपने टूट जाते हैं
नईम वाक़िफ़
ग़ज़ल
ख़ुदा ने जब मुझ बशर को अपना ख़लफ़ बनाया सवाल ये है
तो मैं ने क्यों आसमान सर पर नहीं उठाया सवाल ये है
इदरीस आज़ाद
ग़ज़ल
बे-असर अश्क से अच्छा है जो आँखें फूटें
ना-ख़लफ़ से तो ये बेहतर है कि औलाद नहीं
मुंशी बनवारी लाल शोला
ग़ज़ल
मख़्लूक़ थे पे ख़ालिक़-ओ-ख़ल्लाक़ हो गए
भूखों को यूँ मिला है कि रज़्ज़ाक़ हो गए
सय्यद यूनुस एजाज़
ग़ज़ल
तख़्त सिंह
ग़ज़ल
ग़ैर की नज़रों से बच कर सब की मर्ज़ी के ख़िलाफ़
वो तिरा चोरी-छुपे रातों को आना याद है
हसरत मोहानी
ग़ज़ल
कोई मेरे दिल से पूछे तिरे तीर-ए-नीम-कश को
ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता