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ग़ज़ल
या रुख़ को हवा के फेर दे तू या रुख़ पे हवा के बहता चल
संसार खपा ले अपने में संसार में वर्ना खपना है
फ़रहत कानपुरी
ग़ज़ल
अदा-ए-फ़र्ज़ बर-हक़ पर खपा दो दोस्तो जाँ तक
ये वो सौदा है आख़िर को नहीं जिस में ज़ियाँ होगा
दत्तात्रिया कैफ़ी
ग़ज़ल
ऐ चारासाज़ सर न खपा अपनी राह ले
अच्छा हुआ है 'इश्क़ में ज़ख़्म-ए-जिगर कहीं