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ग़ज़ल
'ज़ुबैर' अक़्वाम-ए-आलम में भी हो तश्हीर वहशत की
गरेबानों के ये टुकड़े ख़त-ए-आसार पर रखना
ज़ुबैर शिफ़ाई
ग़ज़ल
गर कभी आए 'असर' पास हुए वोहीं उदास
ख़ुश शब-ओ-रोज़ पड़े औरों के हाँ रहते हो
सैय्यद मोहम्मद मीर असर
ग़ज़ल
बगूले उड़ रहे हैं जो हमारे दश्त-ए-वहशत में
उन्हीं को ऐ 'असर' हम पर्दा-ए-महमिल समझते हैं