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ग़ज़ल
वो जो वस्त-ए-सीना में है वो फ़ज़ा नहीं कहीं भी
वहाँ मौसम और कुछ है जहाँ ख़त्त-ए-इस्तवा है
शाहिद माकुली
ग़ज़ल
ख़ूँ का ख़त्त-ए-इस्तवा 'माजिद' तअ'स्सुब में घिरा
प्यार की बाद-ए-सबा बाद-ए-शुमाली हो गई
माजिद-अल-बाक़री
ग़ज़ल
ख़ाल-ओ-ख़त के वरक़ लम्हा-ए-रफ़्ता कब का चुरा ले गया
क्या छुपाते हैं अब मेरी बे-चेहरगी की ख़बर आइने
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
आग़ाज़-ए-सब्ज़ा से है जो रुख़्सार पर ग़ुबार
अगले बरस इसे ख़त-ए-गुलज़ार देखना
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
गर मेरी शहादत की बशारत नहीं 'परवीं'
फिर क्यूँ है ख़त-ए-शौक़ के उनवाँ ये निशाँ सुर्ख़
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
ख़त-ए-तक़्दीर से बेहतर मैं समझूँ इस को दुनिया में
तू लिखवा लाए गर क़ासिद बुत-ए-बे-पीर से काग़ज़
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
हिज्र की शब में तिरे ख़त को पढ़ा करते हैं हम
नींद आए तो दिये की लौ को मद्धम भी करें
शकील इबन-ए-शरफ़
ग़ज़ल
हुस्न-ए-रुख़्सार बढ़ा ख़त की नुमूदारी से
ज़ीनत-ए-सफ़हा हुई जदवल-ए-ज़ंगारी से
कल्ब-ए-हुसैन नादिर
ग़ज़ल
थे कल ये ख़त्त-ए-आरिज़-ए-ख़ूबान-ए-सब्ज़ा-रंग
कहते हैं आज ख़ल्क़ जिन्हें सब्ज़ा-ज़ार-हा
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
हैं दीदनी बनफ़शा ओ सुम्बुल के पेच ओ ताब
नक़्शा खींचा हुआ है ख़त-ओ-ज़ुल्फ़-ए-यार का
अकबर इलाहाबादी
ग़ज़ल
ख़त-ओ-रुख़सार-ओ-चशम-ओ-ज़ुल्फ़ दिखला कर लगा कहने
ये रैहाँ है ये गुल है और ये नर्गिस है ये सुम्बुल है