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ग़ज़ल
आह को बाद-ए-सबा दर्द को ख़ुशबू लिखना
है बजा ज़ख़्म-ए-बदन को गुल-ए-ख़ुद-रू लिखना
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
तुम्हारी आस पर किस किस तरह दिल को न समझाया
मगर ये एहतिमाम-ए-ख़ुद-फ़रेबी मेहरबाँ कब तक
आले रज़ा रज़ा
ग़ज़ल
बद्र-ए-आलम ख़लिश
ग़ज़ल
अपनी ही धुन में मगन रहता है सच्चे सुर का साज़िंदा
जैसे कि मैं हूँ मतवाला ख़ुद अपने तर्ज़-ए-निगारिश का
बद्र-ए-आलम ख़लिश
ग़ज़ल
कितना बे-ख़ौफ़ था वो ग़ार की तारीकी में
आज हाथों में लिए शम्स-ओ-क़मर चीख़ता है