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ग़ज़ल
ये बजा कली ने खिल कर किया गुलसिताँ मोअत्तर
अगर आप मुस्कुराते तो कुछ और बात होती
आग़ा हश्र काश्मीरी
ग़ज़ल
अब इन दिनों मेरी ग़ज़ल ख़ुशबू की इक तस्वीर है
हर लफ़्ज़ ग़ुंचे की तरह खिल कर तिरा चेहरा हुआ
बशीर बद्र
ग़ज़ल
जो हुस्न तू ने शक्ल को बख़्शा वो बोल उठा
जो रंग तू ने फूल में डाला वो खिल गया
मुज़्तर ख़ैराबादी
ग़ज़ल
फ़रीहा नक़वी
ग़ज़ल
कोई याद आ भी गई तो क्या कोई ज़ख़्म खिल भी उठा तो क्या
जो सबा क़रीब से हो चली उसे मिन्नतों की घड़ी कहा
अदा जाफ़री
ग़ज़ल
मैं तो उस पौदे को पानी भी नहीं देता कभी
कैसे खिल जाती है ये ग़म की कली शाम के बा'द