आपकी खोज से संबंधित
परिणाम "khilaa.e.n"
ग़ज़ल के संबंधित परिणाम "khilaa.e.n"
ग़ज़ल
जब दुनिया पर बस न चले तो अंदर अंदर कुढ़ना क्या
कुछ बेले के फूल खिलाएँ आँगन की फुलवारी में
अज़रा नक़वी
ग़ज़ल
तपते हुए सहरा में भी कुछ फूल खिलाएँ
कब तक लब-ओ-रुख़्सार का अफ़्साना कहा जाए
मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद
ग़ज़ल
नए शगूफ़े न क्यूँ खिलाएँ जो ग़ुंचा-ओ-गुल को देख पाएँ
बहार तो है चमन की रानी चमन की रानी है और हम हैं
नूह नारवी
ग़ज़ल
लौंग खिलाएँ हम जो कभी तो उस को डालो मुँह से थूक
और ये क्यूँ जी रोज़ मुफ़र्रेह छींके खानी औरों से
मारूफ़ देहलवी
ग़ज़ल
पेट का दोज़ख़ पाट रहे हैं पोरों के ये ज़ख़्म
ओढ़नियों पर फूल खिलाएँ बिटिया सुब्ह-ओ-शाम
इशरत आफ़रीं
ग़ज़ल
ग़ैर की नज़रों से बच कर सब की मर्ज़ी के ख़िलाफ़
वो तिरा चोरी-छुपे रातों को आना याद है