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ग़ज़ल
ताक़त-ए-सब्र तिरे बे-सर-ओ-सामाँ में नहीं
इस्तक़ामत उसे इस आलम-ए-इम्काँ में नहीं
जमीला ख़ुदा बख़्श
ग़ज़ल
ये वज़्अ-ए-क़ौमीयत आइंदा रुख़्सत होने वाली है
नई तहज़ीब से तज्दीद-ए-मिल्लत होने वाली है
नादिर काकोरवी
ग़ज़ल
वहाँ हैं अपनी ख़ुद-आराइयाँ हिजाब नहीं
मक़ाम-ए-जल्वा है पर्दा नहीं नक़ाब नहीं