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ग़ज़ल
मिरी सरिश्त-ए-'सुख़न' में हैं कुछ नए उस्लूब
नई ग़ज़ल ने मुझे भी ख़ुश-आमदीद कहा
अब्दुल वहाब सुख़न
ग़ज़ल
बू-ए-गुल किस क़दर थी हयात-आफ़रीं
ख़्वाब से 'फ़ितरत'-ए-ख़ुश-सुख़न जाग उट्ठा
अब्दुल अज़ीज़ फ़ितरत
ग़ज़ल
ख़ामोश कली सारे गुलिस्ताँ की ज़बाँ है
ये तर्ज़-ए-सुख़न आबरू-ए-ख़ुश-सुख़नाँ है
अब्दुल अज़ीज़ फ़ितरत
ग़ज़ल
ख़ुश-बख़्त हैं आज़ाद हैं जो अपने सुख़न में
ख़ुश-बख़्त हैं जो क़ैद है नेकी के चलन में
अबरार हामिद
ग़ज़ल
याद-ए-ग़ज़ाल-चश्माँ ज़िक्र-ए-समन-अज़ाराँ
जब चाहा कर लिया है कुंज-ए-क़फ़स बहाराँ