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ग़ज़ल
जुज़ 'इश्क़ जंग-ए-दहर से मत पढ़ कि ख़ुश हैं हम
उस क़िस्से की किताब में उस दास्तान से
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
बज़ाँ कर देख मुख धुन का दवानी हो बहाने सूँ
किए सब ख़ुश-नवेसाँ सट क़लम लिख नईं न सक मिसरा
क़ुली क़ुतुब शाह
ग़ज़ल
कहीं ये साफ़ होता है कुदूरत और कीने से
अगर ज़ख़्म-ए-जिगर मिल भी गया दुश्मन के सीने से
सरदार गंडा सिंह मशरिक़ी
ग़ज़ल
ना-चीज़ आप जानते हैं इस क़दर मुझे
उल्फ़त तो जावे भाड़ में कीने पे हर्फ़ है