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ग़ज़ल
किचन में तोड़ कर अंडे सितम तोड़ा है ये कह कर
सफ़ेदी आप की है और सारी ज़र्दियाँ मेरी
बुलबुल काश्मीरी
ग़ज़ल
जो ख़याली थे पुलाओ ज़ाइक़ा उन का लिया
अब दिमाग़ों के किचन में हाँडियाँ उल्टी हुईं
संजय कुमार कुन्दन
ग़ज़ल
बच्चों के छोटे हाथों को चाँद सितारे छूने दो
चार किताबें पढ़ कर ये भी हम जैसे हो जाएँगे
निदा फ़ाज़ली
ग़ज़ल
जाने क्या क्या बोल रहा था सरहद प्यार किताबें ख़ून
कल मेरी नींदों में छुप कर जाग रहा था जाने कौन
निदा फ़ाज़ली
ग़ज़ल
मगर हम मुसिर थे कि हम ने किताबें बहुत पढ़ रखी हैं
बड़ों ने कहा भी कि देखो मियाँ तजरबा तजरबा है
जव्वाद शैख़
ग़ज़ल
हिफ़्ज़ थीं मुझ को भी चेहरों की किताबें क्या क्या
दिल शिकस्ता था मगर तेज़ नज़र ऐसा था