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ग़ज़ल
चलते हैं कू-ए-यार में है वक़्त-ए-इम्तिहाँ
हिम्मत न हारना दिल-ए-बीमार देखना
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
क्यूँ न ख़ू-ए-ख़ाक से ख़स्ता रहे मेरी अना
पा-ब-गिल हूँ और ख़मीर-ए-मोतबर मिट्टी का है
अब्बास ताबिश
ग़ज़ल
सुब्ह कू-ए-यार में बाद-ए-सबा पकड़ी गई
या'नी ग़ीबत में गुलों की मुब्तला पकड़ी गई
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
यही धुन थी कहीं मेरा दिल-ए-गुम-गश्ता मिल जाए
इसी वहशत में बरसों ख़ाक छानी कू-ए-जानाँ की
मोहम्मद अब्बास सफ़ीर
ग़ज़ल
कहीं सुब्ह-ओ-शाम के दरमियाँ कहीं माह-ओ-साल के दरमियाँ
ये मिरे वजूद की सल्तनत है अजब ज़वाल के दरमियाँ
बद्र-ए-आलम ख़लिश
ग़ज़ल
निगाहों को ज़बाँ करना ख़मोशी को बयाँ करना
अयाँ करना भी राज़-ए-दिल कभी तो यूँ अयाँ करना
अब्बास अली ख़ान बेखुद
ग़ज़ल
'अबस है पेश-ए-अर्बाब-ए-सुख़न अज़्म-ए-सुख़न मुझ को
वफ़ा कहने न देगी क़िस्सा-ए-रंज-ओ-मेहन मुझ को
अब्बास अली ख़ान बेखुद
ग़ज़ल
जेब में कुछ भी नहीं दिल है अमीरों जैसा
हाथ ख़ाली हैं मगर ख़ू-ए-अता रखते हैं