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ग़ज़ल
क्या मज़ा देती है बिजली की चमक मुझ को 'रियाज़'
मुझ से लपटे हैं मिरे नाम से डरने वाले
रियाज़ ख़ैराबादी
ग़ज़ल
ऐ तअ'स्सुब ज़दा दुनिया तिरे किरदार पे ख़ाक
बुग़्ज़ की गर्द में लपटे हुए मेआ'र पे ख़ाक
अहमद ख़याल
ग़ज़ल
अहमद सलमान
ग़ज़ल
तू ने देखा है कभी एक नज़र शाम के बा'द
कितने चुप-चाप से लगते हैं शजर शाम के बा'द