aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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करता हूँ जम्अ' फिर जिगर-ए-लख़्त-लख़्त कोअर्सा हुआ है दावत-ए-मिज़्गाँ किए हुए
जवाँ होने लगे जब वो तो हम से कर लिया पर्दाहया यक-लख़्त आई और शबाब आहिस्ता आहिस्ता
किस को है ज़ौक़-ए-तल्ख़-कामी लेकजंग बिन कुछ मज़ा नहीं होता
यक-लख़्त गिरा है तो जड़ें तक निकल आईंजिस पेड़ को आँधी में भी हिलते नहीं देखा
ख़त-ए-लख़्त-ए-दिल यक-क़लम देखते हैंमिज़ा को जवाहर रक़म देखते हैं
अब मैं रस्ते में लेट जाऊँ क्याजाने वालों को रोकने के लिए
जामा-ए-एहराम-ए-ज़ाहिद पर न जाथा हरम में लेक ना-महरम रहा
ऐ वाए-ग़फ़लत-ए-निगह-ए-शौक़ वर्ना याँहर पारा संग लख़्त-ए-दिल-ए-कोह-ए-तूर था
गह लोहू टपकता है गह लख़्त-ए-दिल आँखों सेया टुकड़े जिगर ही के हर आन निकलते हैं
थकन को ओढ़ के बिस्तर में जा के लेट गएहम अपनी क़ब्र-ए-मुक़र्रर में जा के लेट गए
थे बुरे मुग़्बचों के तेवर लेकशैख़ मय-ख़ाने से भला खिसका
ऐ अब्र क़सम है तुझे रोने की हमारेतुझ चश्म से टपका है कभू लख़्त-ए-जिगर भी
रहा मैं दर-ए-पस-ए-दीवार-ए-बाग़ मुद्दत लेकगई गुलों के न कानों तलक फ़ुग़ाँ मेरी
तब नाज़-ए-गिराँ माइगी-ए-अश्क बजा हैजब लख़्त-ए-जिगर दीदा-ए-ख़ूँ-बार में आवे
इक निशानी है किसी शहर की बर्बादी कीनारवा बात का यक-लख़्त रवा हो जाना
कहता तिरा कुछ सोख़्ता-जाँ लेक अजल नेफ़ुर्सत न उसे मिस्ल-ए-चराग़-ए-सहरी दी
तुम्हारी याद के चर्कों से लख़्त लख़्त है जीकि ख़ंजरों से किसी ने बदन को क़ाशा है
हो किस घमंड में ऐ लख़्त लख़्त दीदा-वरोतुम्हें भी क़ातिल-ए-मेहनत-कशाँ कहेगा लहू
गए वो दिन कि मुझी तक था मेरा दुख महदूदख़बर के जैसा ये अफ़्साना लख़्त-लख़्त न था
लख़्त-ए-जिगर से है रग-ए-हर-ख़ार शाख़-ए-गुलता चंद बाग़-बानी-ए-सहरा करे कोई
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