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ग़ज़ल
न गँवाओ नावक-ए-नीम-कश दिल-ए-रेज़ा-रेज़ा गँवा दिया
जो बचे हैं संग समेट लो तन-ए-दाग़-दाग़ लुटा दिया
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
मुझे हम-सफ़र भी मिला कोई तो शिकस्ता-हाल मिरी तरह
कई मंज़िलों का थका हुआ कहीं रास्तों में लुटा हुआ
इक़बाल अज़ीम
ग़ज़ल
तख़्त क्या चीज़ है और लाल-ओ-जवाहर क्या हैं
इश्क़ वाले तो ख़ुदाई भी लुटा देते हैं