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ग़ज़ल
कभी मैं जुरअत-ए-इज़हार-ए-मुद्दआ तो करूँ
कोई जवाज़ तो हो लुतफ़-ए-बेसबब के लिए
सय्यद आबिद अली आबिद
ग़ज़ल
जो मज़ा है तिश्नगी में है जो लुत्फ़-ए-बे-क़रारी
तुझे क्या बताऊँ हमदम तिरा दिल जला नहीं है
हैरत फ़र्रुख़ाबादी
ग़ज़ल
रवानी-हा-ए-मौज-ए-ख़ून-ए-बिस्मिल से टपकता है
कि लुत्फ़-ए-बे-तहाशा-रफ़्तन-ए-क़ातिल-पसंद आया
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
उस को इनआम-ए-ख़ुदी और इस पर लुत्फ़-ए-बे-ख़ुदी
वो करम करते हैं ज़र्फ़-ए-अहल-ए-इरफ़ाँ देख कर
फ़ानी बदायुनी
ग़ज़ल
सरमाया-ए-हयात है वो लुत्फ़-ए-बे-पनाह
बज़्म-ए-जहाँ में दिल से लगाया गया मुझे
सय्यद कामरान ज़ुबैर कामी
ग़ज़ल
जफ़ा-ए-बे-सबब कम है कि जौर-ए-ना-रवा कम है
तिरी बे-दाद ऐ ज़ालिम न होने पर भी क्या कम है
मेला राम वफ़ा
ग़ज़ल
बे-सबब ऐ दिल-ए-नादाँ कहीं लौटा तो नहीं
उस ने आवाज़ ही दी है तुझे रोका तो नहीं
मुकर्रम हुसैन आवान ज़मज़म
ग़ज़ल
ख़ंदा-ए-ज़ेर-ए-लब भी है गिर्या-ए-बे-सबब भी है
बे-हमा-ओ-बहर-ए-अदा रंग जमा रहे हो तुम
मीम हसन लतीफ़ी
ग़ज़ल
किसी के लुत्फ़-ए-बे-पायाँ ने कुछ यूँ सू-ए-दिल देखा
कि अब ना-कर्दा जुर्मों की पशेमानी नहीं जाती