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ग़ज़ल
महव-ए-हैरत हूँ कि आख़िर ये तमाशा क्या है
सुब्ह ख़ुद पूछ रही है कि उजाला क्या है
हबीब अहमद अंजुम दतियावी
ग़ज़ल
महव-ए-हैरत हूँ ज़मीं-ज़ादे कहाँ तक आ गए
जिन को रहना था ज़मीं पर आसमाँ तक आ गए
सय्यद नवाब हैदर नक़वी राही
ग़ज़ल
जिस में इक सोज़ भी हो साज़ भी हो ऐ 'हैरत'
इस से बढ़ कर कोई अंदाज़-ए-ग़ज़ल क्या होगा
हैरत शिमलवी
ग़ज़ल
सितम का और मौक़ा' उस को मिल जाएगा ऐ 'हैरत'
इसी बा'इस वो जीने की दु'आएँ मुझ को देता है
हैरत इलाहाबादी
ग़ज़ल
सितम का और मौक़ा उस को मिल जाएगा ऐ 'हैरत'
इसी बाइ'स वो जीने की दुआएँ मुझ को देता है